पुल: जिसके नीचे नदी नहीं बहती
Wednesday, 29 May 2019
रेनकोट
निर्देशक रितुपर्णो घोष की यह फिल्म, ओ.हेनरी की प्रसिद्ध कहानी "द गिफ्ट ऑफ़ मैगी" से ली गई है... श्री वेंकटेश फिल्म्स के द्वारा बनाई गई इस फिल्म के डायलॉग्स रितुपर्णो घोष ने लिखे हैं... यह कहानी दो प्रेमियों की है जो कि अलग हो जाते है और फिर एक दिन यूँ ही मिलते हैं और अपने आपको खुश दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन बिना बताए ही एक-दूसरे की सच्चाई जान लेते है...
यह एक ऐसी फ़िल्म थी जिसको यूँ तो सफलता नहीं मिली थी पर एक ख़ास दर्शक वर्ग को फिल्म पसंद आई... फिल्म में अजय देवगन, ऐश्वर्या रॉय, सुरेखा सीकरी, अन्नू कपूर, मौली गांगुली, समीर धर्माधिकारी आदि ने मुख्य भूमिका निभाई थी... गुलज़ार और रितुपर्णो घोष के लिखे गीतों को शास्त्रीय धुनों पर आधारित संगीत दिया है देबोज्योति मिश्रा ने...* हमारी गलियां होके आना...
* मथुरा नगरपति काहे तुम गोकुल आए...
* शाम ढले सखिया सब लौट गईं सारी अकेले हम नदिया किनारे...
* कितने बरस बीते तुम घर न आए रे...
* पिया तोरा कैसा अभिमान...
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फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला... ऐश्वर्या रॉय को बेहतरीन अदाकारी के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का क्रिटिक्स चॉईस अवार्ड्स मिला... रितुपर्णो घोष का निर्देशन और अजय देवगन और ऐश्वर्या रॉय के शानदार अभिनय की वजह से यह मन पर छाप छोड़ने वाली फ़िल्म है...
Wednesday, 6 March 2019
छोटे बच्चों को पीठ के बल लेट और पैरों को मोड़ झूला झुलाते हैं जिसे घुघुआ मन्ना या अलिया मलिया के नाम से जानते हैं। झुलाते हुए एक लोरी भी गाते हैं जिसका 5 रूप बड़ी मुश्किल से मुझे याद आया है, अलग अलग क्षेत्रों में इसे अलग तरीके से गाते हैं। ये आमतौर इसे बुआ या मौसी के द्वारा गाया जाता है, ये इसको गाते हुए दिए जाने वाले ताने(गाली) से पता चलता है। अगर मौसी गाती है तो बुआ को गाली देती हैं और मौसी बुआ को...
1)
घुघुआ मन्ना
उपजे धनवा
कान दुनू सोनमा
रे बौआ तू कथी के
एली के की बेली के
माय बाप चमेली के
पितिया पितम्बर के
फूफू छिनर कठगूलर के
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
2)
घुघुआ झूल
कनेर के फूल
बाबू के जूठ कूठ के खाय
मम्मी खाय
मम्मी के झूठ कूठ कौआ खाए
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
3)
घुघुआ मन्ना, उपजे धन्ना
बाबू खाए दूध-भतवा
कुतवा चाटे पतवा
आबे दे रे कुतवा
मारबऊ दू लतवा
गे बुढ़िया बर्तन बासन
सब सरिया के रखिहे तू
नया घर उठे, पुरान घर गिरे।
4)
अलिया गे मलिया गे
घोड़ा बरद खेत खाईछऊ गे
कहाँ गे?
डीह पर गे
डीहsक रखवार के गे?
बाबा गे
बाबा गेलखुन पूर्णिया गे
लाल लाल बिछिया लैथुन गे
कोठी पर झमकैथुन गे
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
5)
तोरा मायो न झुलैलकऊ
तोरा बापो न झुलैलकऊ
तोरा तार तर वाली मौसियो नई झुलैलकऊ
तोरा हमहीं झुलैलियऊ
लाल घर उठे, पुरान उठे।
छोटे बच्चों को पीठ के बल लेट पैरों को मोड़ झूला झुलाते हैं जिसे घुघुआ मन्ना या अलिया मिल्य के नाम से
छोटे बच्चों को पीठ के बल लेट पैरों को मोड़ झूला झुलाते हैं जिसे घुघुआ मन्ना या अलिया मिल्य के नाम से
छोटे बच्चों को पीठ के बल लेट और पैरों को मोड़ झूला झुलाते हैं जिसे घुघुआ मन्ना या अलिया मलिया के नाम से जानते हैं। झुलाते हुए एक लोरी भी गाते हैं जिसका 5 रूप बड़ी मुश्किल से मुझे याद आया है, अलग अलग क्षेत्रों में इसे अलग तरीके से गाते हैं। ये आमतौर इसे बुआ या मौसी के द्वारा गाया जाता है, ये इसको गाते हुए दिए जाने वाले ताने(गाली) से पता चलता है। अगर मौसी गाती है तो बुआ को गाली देती हैं और मौसी बुआ को...
1)
घुघुआ मन्ना
उपजे धनवा
कान दुनू सोनमा
रे बौआ तू कथी के
एली के की बेली के
माय बाप चमेली के
पितिया पितम्बर के
फूफू छिनर कठगूलर के
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
2)
घुघुआ झूल
कनेर के फूल
बाबू के जूठ कूठ के खाय
मम्मी खाय
मम्मी के झूठ कूठ कौआ खाए
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
3)
घुघुआ मन्ना, उपजे धन्ना
बाबू खाए दूध-भतवा
कुतवा चाटे पतवा
आबे दे रे कुतवा
मारबऊ दू लतवा
गे बुढ़िया बर्तन बासन
सब सरिया के रखिहे तू
नया घर उठे, पुरान घर गिरे।
4)
अलिया गे मलिया गे
घोड़ा बरद खेत खईछऊ गे
कहाँ गे?
डीह पर गे
डीहsक रखवार के गे?
बाबा गे
बाबा गेलखुन पूर्णिया गे
लाल लाल बिछिया लैथुन गे
कोठी पर झमकैथुन गे
लाल घर उठे, पुरान घर गिरे।
5)
तोरा मायो न झुलैलकऊ
तोरा बापो न झुलैलकऊ
तोरा तार तर वाली मौसियो नई झुलैलकऊ
तोरा हमहीं झुलैलियऊ
लाल घर उठे, पुरान उठे।
Sunday, 16 December 2018
हम सीढ़ियां हैं
आप आगे बढने की चाहत में हर रोज़ हमें रौंदते हैं
आप बढकर कभी नहीं रुकते और न तो वापस देखते हैं
हमारा दिल आपके पैरों की धूल पा गर्वित होता है
लेकिन नियमित ठोकर हमें भीतर से तोड़ती हैं

आप हमारी पीड़ा जानते हैं
इसलिए आप हमारे दिल की छाले को छिपाने के लिए
हमपर कालीन बिछा देते हैं
आप अपने उत्पीड़न के निशान पर
पर्दा डालने की कोशिश करते हैं
और आप इस दुनिया से अपने आगे बढ़ चुके
कदमों के लौटने का निशाँ छिपाना चाहते हैं
लेकिन अपने दिल में हम सब जानते हैं
कि किसी बड़े साम्राज्य की तरह आपके अत्याचार भी
हमेशा के लिए छुप नहीं सकते
आप पाँव कभी भी लड़खड़ा सकते हैं
(सुकांता भट्टाचार्य की बांग्ला कविता का अनुवाद)
Saturday, 24 June 2017
काश मेरी बात उस तक पहुँचे
3-4 महीने पहले मैं अपने एक रिलेटिव से मिलने उनके घर गई थी। जिनके घर मैंने अपने बचपन के न जाने कितने दिन खेलते-उधम मचाते बिताए थे। मैं जब भी जाती हूँ तो एक बार सबसे मिलने की कोशिश जरूर करती हूँ। मिलना सम्भव नहीं हुआ तो (उन सबसे जो मुझसे रखना चाहते हों) कॉल करके ही सही सम्पर्क बनाए रखती हूँ।
हाँ तो जिनकी मैं बात कर रही हूँ उन पति-पत्नी से हमें बहुत प्यार मिला क्योंकि दोनों ही स्नेह लुटाने वाले जीव हैं। उनका एक ही बच्चा था (अभी भी है), इसलिए दोनों की धुरी वही था। उसका नाम हम पप्पू मान लेते हैं। ठीक मेरी उम्र का पप्पू बहुत पढ़ाकू था (यूँ बुरे तो हम भी न थे), हम जब भी उसके यहाँ जाते वो बस पढ़ता हुआ मिलता। लेकिन हमें आश्चर्य होता कि पप्पू अपने माँ-पापा के आवाज़ लगाने पर कोई जवाब नहीं देता, जैसे कि उसके कान ही न हों। हम सोचते ये पप्पू कैसा बच्चा है कि मम्मी पापा के आवाज़ लगाने पर भी हिलता नहीं है। फिर धीरे धीरे समझ में आया कि वो दोनों अपने एकमात्र संतान में ऐसे खो गए थे कि जब भी पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे को बुलाते तो पप्पू पुकारते और पप्पू तो अब सिर्फ 'बेटा' कह कर पुकारने पर ही सुनता था।
अब वो पप्पू मैकेनिकल इंजीनियर बन किसी बड़ी कम्पनी में अच्छी सैलरी पाता है। नौकरी लगते ही अच्छे बेटे की तरह पापा से कहा अब आप अपना काम बंद कर दीजिए। मेरी मम्मी के मना करने के बावजूद उन्होंने अपना काम बंद कर दिया। फिर माँ-पापा ने बड़े अरमान से उसकी शादी की, बाल-बच्चे होने पर बेटे के पास जाकर बहू की देखभाल भी की। इस बीच मुझे पता चलता रहा कि वो बेटा अपने आप में व्यस्त हो गया है और माँ-बाप पीछे छूटते चले गए हैं।
उसके पापा ने फिर से अपने लिए काम की तलाश की और नए सिरे से फिर ज़िन्दगी शुरू की। आम माँ-बाप की तरह बेटे की कोई ग़लती भी नहीं देख पाते।
हाल लेते रहने और इधर उधर मिलते रहने के बावजूद उनके घर जाना बहुत सालों से नहीं हो पाया था। इधर जब मैं गई तो बातों बातों में पप्पू की बात तो आनी ही थी। उनका घर जो कि एक समय में अच्छा दिखता था अब उसकी दशा नाजुक थी।
मैंने पूछा 'पप्पू को दिखता नहीं, इसे ठीक क्यों नहीं करवाता?'
इस पर उसकी माँ ने कहा: "अब वो यहाँ आता ही कहाँ है। ये घर मिट्टी का है न, उसके और बच्चों के जूते/कपड़े ख़राब हो जाते हैं। जब आता है होटल में ठहरता है और हमें वहीं बुलवा लेता है।"
मैंने बोला 'और आप मिलने चली जाती हैं।'
उन्होंने कहा: "क्या करूँ माँ हूँ न दिल नहीं मानता कि बच्चों के आने पर उनसे न मिलूँ।"
जब से मिल कर आई हूँ कुँअर बेचैन की पंक्तियाँ बार-बार मन में घुमड़ रही हैं:
"जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रम जल ने
दादी की हँसुली ने माँ की पायल ने
उस कच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने में कतराती है।"
दादी की हँसुली ने माँ की पायल ने
उस कच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने में कतराती है।"
आज उसके पास एक राज्य की राजधानी में बड़ा घर, गाड़ी विथ ड्राइवर है जिसके मद में छोटे शहर के छोटे घर और उसमें रहने वाले अपने माँ-बाप को भूल गया है। जब उसके माँ-पापा का संघर्ष और स्नेह मुझे याद है फिर वो कैसे भूला बैठा है। काश मेरी बात उस तक पहुँचे...
Saturday, 27 May 2017
निकालने दो समय / निज़ार कब्बानी
मुझे निकालने दो समय
इस प्यार के स्वागत के लिए
जो अनचाहे ही आया है।
मुझे निकालने दो समय
ताकि याद कर सकूँ
वह चेहरा जो अचानक उग आया है
विस्मृतियों के जंगल से।
मुझे समय दो ताकि
भाग सकूँ इस प्यार से
जो रोक रहा है
मेरी धमनियों में खून को बहने से।
मुझे समय निकालने दो
ताकि मैं याद कर सकूँ
तुम्हारा नाम, मेरा नाम
और वो जगह जहाँ मैंने जन्म लिया।
मुझे निकालने दो समय
कि जान सकूँ कहाँ मेरी मृत्यु होगी
और कैसे मेरा पक्षी के रूप में
पुनर्जन्म होगा तुम्हारी आँखों में।
मुझे निकालने दो समय
कि पता लगा सकूँ
हवा और तरंगों की अवस्था को
और जान सकूँ दशा नक्षत्रों की...
औरत!! (मैं) जो जीती रही है
भविष्य के मिर्च और अनारदानों में,
मुझे एक देश दो, जो कि
मुझसे भुलवा सके तमाम दूसरे देशों को,
और मुझे दो समय
कि मैं दूर रह सकूँ इस अन्डालुसियन* चेहरे से
इस अन्डालुसियन आवाज़ से
इस अन्डालुसियन मौत से
जो हर तरफ से आती है...
मुझे निकालने दो समय कि
कर सकूँ
भविष्यवाणी बाढ़ की...
औरत!! जो पहले
जादुई किताबों में खुदी हुई थी,
तुम्हारे आने से पहले
दुनिया गद्य थी...
अब जन्मी है उसमें कविता...
मुझे समय दो कि मैं पकड़ सकूँ
मेरा यौवन, जो दौड़ रहा है
मुझसे होकर तुम्हारे अंतस्थल तक...
*स्पेन का दक्षिणी पथरीला तट
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