हमेशा चुप्पियाँ नहीं ढल पाती समय के साँचे में... चुप्पियाँ कभी कभी बहुत कुछ अनकहा छोड़ देती हैं... याद करो न जब झरते हरसिंगार के तले मैं कहती थी कि सुनो मेरी ख़ामोशी को...
तुम कहते थे कि "अगर ख़ामोशी सब कह पाती तो शब्द बने ही न होते... प्रकृति आवाज़ बनाती ही नहीं... और तुम्हारी आवाज़ भी तो मुझे सुननी है।"
याद आया न? इसलिए मुझे कहने दो जो कि कहना है... जो समय कहलवा लेना चाहता है मुझसे...
हाँ तुम बस इतना करो कि जब मैं कहूँ तुम सुनो बस ख़ामोशी से...
सुनो, सुनो न!!
फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!
वही जहाँ
पिछले जनम में
हम बैठा करते थे
उसके नीचे और
वो बारिश करता था
हमारे ऊपर अपने प्रेम की
मुझे सब याद है
तुम भूले तो नहीं...
वो हरसिंगार
फिर बुलाता है
रोज़ सपनों में आता है
ठीक उसी बेला में
मैं फिर चौंक जगती हूँ
तुमको पुकारती हूँ
जवाब नहीं मिलता तुमसे
तुम भूले तो नहीं न...
सुनो, सुनो न!!
फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!"

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