Thursday, 27 April 2017

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह,
कल बदलेंगे हम भी उनको कैलेंडर की तरह...!!

हमारी दास्ताँ यूँ ही रायगाँ हो न पाएगी...
पढ़े जाएँगे हम भी कभी निसाबों की तरह...!!

उन आँखों में हमें आज अपनी पहचान न मिली...
जिनका दावा था रहते हो इनमें पुतली की तरह...!!

गंगाजल की तरह संभाला था जिनको हमने...
अपनी आँखों से बहा देंगे उनको आँसू की तरह...!!

रायगाँ= व्यर्थ
निसाबों= पाठ्य पुस्तक

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