कोई कहता है कि मैं सुंदर हूँ तो मैंने मान लिया कि हूँ, किसी ने कहा कि मुझे ग़लतफ़हमी है कि मैं सुंदर हूँ तो उसे समझा दिया कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी नहीं है, मैं जो भी हूँ मुझे पता है। मैं जानती हूँ कि बहुतों के सामने मैं कुछ भी नहीं लेकिन इससे क्या होता है...
वो जो बहुत ख़ूबसूरत हैं वो अपने लिए हैं। उनकी अपनी ज़िन्दगी है और वो अपनी उस कहानी में मुख्य पात्र हैं लेकिन ये मेरी ज़िन्दगी है जिसकी हीरोईन तो मैं ही हूँ। मुझे न किसी से कोई कॉम्पलेक्स है न कोई जलन है।
तो अब बात मेरी: आज से 20 साल पहले ठीक यानि कि 16 मई 1996 को मेरी शादी का फंक्शन शुरू हुआ था, पहला दिन यानि सगुन की हल्दी लगी और शादी का मंडप बनाया गया था। शादी बहुत ही जल्दी में तय हो गई थी, मेरी सासु माँ की मेरी मम्मी से पुरानी पहचान थी। उन्होंने रिश्ता माँगा और माँ ने थोड़ी ना-नुकुर के बाद रिश्ते को मंजूरी दे दी थी। जब सासु माँ अपने परिवार के साथ मुझे देखने आई थीं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि:
"मेरे बेटे को तुम पसन्द हो लेकिन क्या तुम्हें मेरा बेटा पसन्द है?"
मैं चुप रही।
उन्होंने सवाल फिर दुहराया।
और मैं बेसाख़्ता बोल पड़ी: मैं कोई मुस्लिम हूँ कि क़ुबूल है, क़ुबूल है कहना ही पड़ेगा।
ख़ैर तो ऐसे शुरू हुई थी ये कहानी...
क्रमशः

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