कहानी वत्स गोत्रीय कन्या के भारद्वाजों की बहू होने की...
भाग-2
1995 के अंत से मेरी शादी की थोड़ी बहुत चर्चा शुरू हो चुकी थी, ये वो समय था जब शाहरूख खान की "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे" आ चुकी थी और मेरे दोस्तों के साथ-साथ मेरी फैमिली में भी शाहरुख़ सबको बहुत पसन्द आ रहा था। लेकिन इससे पहले दो फ़िल्म आ चुकी 1992 में रोज़ा और 95 में बॉम्बे और दोनों में ही हीरो थे 'अरविंद स्वामी'। दोनों ही फ़िल्मे शादी से शुरू होकर आगे की ज़िन्दगी की थी। जहाँ सब शाहरुख खान को पसन्द कर रहे थे वहीं मुझे अरविन्द स्वामी अच्छा लगा था। दोनों ही फिल्मों में कोई तड़क-भड़क, बड़े घरों की कहानी, फ़ालतू की कॉमेडी नहीं थी, तो मेरा सीधा सादा मन हम जैसे घरों की ही कहानी पर रुक गया था।
ऐसे में जब मुझे देखने के लिए मेरी सासु माँ अपने बेटे के साथ आईं और मैंने एक झलक देखने पर ही पाया कि ये तो कुछ-कुछ वैसा ही है हालाँकि मैं लगातार रो रही थी। और अपने रोने का कारण आज तक समझ नहीं पाई हूँ।
तो मेरी शादी का कार्यक्रम शुरू हो चुका था और दिन में 5 बार मुझे उबटन लगाया जा रहा था... माँ आमतौर पर बस एक बार आकर विधि की शुरुआत करती और हट जाती थी। बाकी भाभी, मौसी, दीदी, चाची वगैरह गीत गाती और उबटन लगा कर काजल लगा देतीं।
"कथी के कटोरी में आगर चन्दन, कथी में तेल फुलेल
अपटन लागि रही
सोने कटोरी में आगर चन्दन, चाँदी कटोरी फुलेल
अपटन लागि रही
आजु सिया जी के अपटन लगाऊ, मंगल गीत सुनाऊ
अपटन लागि रही।"
पियरी यानि पीली साड़ी और काजल लगाए हुए मैं तनिक अलग सी दिख रही थी। हमारे इधर कहते हैं कि इससे लड़कियों पर सीरी चढ़ती है और वो सुंदर दिखती है। जबकि पूरा शरीर हल्का पीला दिखता है।
(एक तस्वीर अरविंद स्वामी की है बाकी तीन मेरी कहानी के हीरो की।)
क्रमश:

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