जब-जब बेर का मौसम आता है, मुझे अपना बचपन और बेर से जुड़ी कहानियां याद आती हैं। हमें साल में एक दिन उस जगह पर जाने की इज़ाज़त मिलती थी और हम उसका पूरा फ़ायदा उठाते थे। इसी समय में किसी चतुर्दशी को एक व्रत होता है 'नरक निवारण चतुर्दशी'। इस व्रत को शाम में तारा देखकर और बेर खाकर खोला जाता है।
हमें यानि मुझे, मेरी छोटी बहन और हमारे आस पास रहने वाले हम उम्रों को दूर एक मन्दिर जो कि तालाब के किनारे पर था जाकर पूजा करने की इज़ाज़त मिलती थी। वो असल में पूजा नहीं होती थी होता था बहाना। स्कूल से आधी छुट्टी और बेर तोड़ कर लाने का।(माँ बाद में बताती थी उसे सब पता था, माएँ सब जान जाया करती हैं) बेर बेचने वाले आते थे या नहीं ये बात याद नहीं।
तो मैं अपनी मंडली के साथ पहुँच जाती थी वहाँ उस तालाब के किनारे। पेड़ तालाब के ठीक किनारे था और पूरा का पूरा तालाब में झुका हुआ। और ये पेड़ उस किनारे पर था जिधर लोग पानी गहरा होने की वजह से नहीं जाते थे। लेकिन हम जाते थे क्योंकि बेर के बग़ैर व्रत पूरा होना असम्भव था।
:) मैं और एकाध और बच्चे पेड़ पर चढ़ते थे और मेरी बहन और कुछ छोटे बच्चे नीचे खड़े अपने भाई बहन के द्वारा तोड़े गए बेर जमा करते थे।
बेर में काँटे होते हैं जो हमारे हाथ-पाँव में चुभ जाया करते थे। काँटों और पानी में गिर जाने के डर से बच्चे ऊपर तक नहीं जाते थे। इसलिए ऊपर बड़े और पके बेर बचे रह जाते थे। मैं उनको वहीं छोड़ उतर जाऊँ ये बहुत मुश्किल काम था। मेरी बहन धमकी देती कि "नीचे उतर आओ वरना माँ को बता दूँगी"। मैं कहती बस एक वो वाला तोड़ लूँ माँ को अच्छा लगेगा। माँ का नाम आते वो कहती "अच्छा बस एक और।" मैं और ऊपर चढ़ती जाती, काँटे कभी इधर चुभते कभी उधर लेकिन परवाह उसकी किसे थी। और जब मैं सही-सलामत नीचे उतर आती तो मेरी बहन सबको गर्व से कहती उसके पास सबसे अच्छे और ज़्यादा बेर है। उसके चेहरे की वो गर्व मिश्रित ख़ुशी मुझे याद है। अब भी जब किसी से ये बातें करती है तो वही ख़ुशी दिखाई देती है।
माँ भी बेर खाकर बहुत खुश हुआ करती थी हालाँकि काँटों की वजह से डाँट भी पड़ती थी। अब कभी सोचती हूँ तो लगता है कि बेर माँ को कुछ ख़ास पसन्द नहीं थे क्योंकि कभी बाज़ार से ला कर या मंगवा कर खाते नहीं देखा। मैं भी अब नहीं लाती और न ही खाती हूँ लेकिन जब भी बेर देखती हूँ "उन दिनों" को फ़िर से जीती हूँ।
(ये 1986 तक की बात है।)
Sunday, 14 May 2017
मेरा बचपन
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