Thursday, 27 April 2017

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह,
कल बदलेंगे हम भी उनको कैलेंडर की तरह...!!

हमारी दास्ताँ यूँ ही रायगाँ हो न पाएगी...
पढ़े जाएँगे हम भी कभी निसाबों की तरह...!!

उन आँखों में हमें आज अपनी पहचान न मिली...
जिनका दावा था रहते हो इनमें पुतली की तरह...!!

गंगाजल की तरह संभाला था जिनको हमने...
अपनी आँखों से बहा देंगे उनको आँसू की तरह...!!

रायगाँ= व्यर्थ
निसाबों= पाठ्य पुस्तक

Tuesday, 25 April 2017

ईश्वर की कृति

स्याही जब समाती है
बूँद-बूँद मुझमें
तब लिखी जाती है कविता
और तब लिखी जाती है
तमाम मुश्किलों के बाद
सम्भावनाएँ, उम्मीद और जीवन...
ईश्वर ने दिया है मुझे जीवन
बहुत ही मिन्नतों मनौतियों के बाद
ताकि रची जा सके ख़ुशी
बीजी जा सके कोरी आँखों में सपने
और उगाई जा सकें
उससे प्रेम और विश्वास की फसलें...
मुझे यकीन है खुद पर कि
मैं बिखेरती हूँ ख़ुशी
और बहती नदी सी मैं
बहा ले जाती हूँ अपने साथ
पास आने वालों के
दुःख के कारण और अकारण को...
मुझे यकीन है खुद पर कि
मैं हूँ ईश्वर की एक अनुपम कृति...!!

(मेरे आँचल में जो ये सितारे टँके हैं न, वो सब सारी परेशानियां और दर्द है जो कोई मुझसे बाँट गया और ये जो चेहरे पर ख़ुशी है न वो उस विश्वास से आया है जो मेरे आसपास के लोगों का मुझ पर है। इसीलिए आत्ममुग्धता से भी ज़्यादा पसंद हूँ मैं खुद को...

चाक देखा है?

सुनो!!
चाक देखा है?
वही चाक कुम्हार वाला
जो नाचता रहता है
एक कील पर
जो स्थिर रहता है
मगर उसके ऊपर गति होती है
जिससे होता है सृजन
है न?

बस
तुम वही कील बनो
अपने भीतर उसी कील को पा लो
जहाँ तुम स्थिर ही रहो
और अपने भीतर स्थित कील के सहारे
नाचने दो संसार को
ताकि सृष्टि में होता रहे
सृजन
होता रहे
नवनिर्माण...
(एक सलाह)