Saturday, 24 June 2017

काश मेरी बात उस तक पहुँचे

3-4 महीने पहले मैं अपने एक रिलेटिव से मिलने उनके घर गई थी। जिनके घर मैंने अपने बचपन के न जाने कितने दिन खेलते-उधम मचाते बिताए थे। मैं जब भी जाती हूँ तो एक बार सबसे मिलने की कोशिश जरूर करती हूँ। मिलना सम्भव नहीं हुआ तो (उन सबसे जो मुझसे रखना चाहते हों) कॉल करके ही सही सम्पर्क बनाए रखती हूँ।
हाँ तो जिनकी मैं बात कर रही हूँ उन पति-पत्नी से हमें बहुत प्यार मिला क्योंकि दोनों ही स्नेह लुटाने वाले जीव हैं। उनका एक ही बच्चा था (अभी भी है), इसलिए दोनों की धुरी वही था। उसका नाम हम पप्पू मान लेते हैं। ठीक मेरी उम्र का पप्पू बहुत पढ़ाकू था (यूँ बुरे तो हम भी न थे), हम जब भी उसके यहाँ जाते वो बस पढ़ता हुआ मिलता। लेकिन हमें आश्चर्य होता कि पप्पू अपने माँ-पापा के आवाज़ लगाने पर कोई जवाब नहीं देता, जैसे कि उसके कान ही न हों। हम सोचते ये पप्पू कैसा बच्चा है कि मम्मी पापा के आवाज़ लगाने पर भी हिलता नहीं है। फिर धीरे धीरे समझ में आया कि वो दोनों अपने एकमात्र संतान में ऐसे खो गए थे कि जब भी पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे को बुलाते तो पप्पू पुकारते और पप्पू तो अब सिर्फ 'बेटा' कह कर पुकारने पर ही सुनता था।
अब वो पप्पू मैकेनिकल इंजीनियर बन किसी बड़ी कम्पनी में अच्छी सैलरी पाता है। नौकरी लगते ही अच्छे बेटे की तरह पापा से कहा अब आप अपना काम बंद कर दीजिए। मेरी मम्मी के मना करने के बावजूद उन्होंने अपना काम बंद कर दिया। फिर माँ-पापा ने बड़े अरमान से उसकी शादी की, बाल-बच्चे होने पर बेटे के पास जाकर बहू की देखभाल भी की। इस बीच मुझे पता चलता रहा कि वो बेटा अपने आप में व्यस्त हो गया है और माँ-बाप पीछे छूटते चले गए हैं।
उसके पापा ने फिर से अपने लिए काम की तलाश की और नए सिरे से फिर ज़िन्दगी शुरू की। आम माँ-बाप की तरह बेटे की कोई ग़लती भी नहीं देख पाते।
हाल लेते रहने और इधर उधर मिलते रहने के बावजूद उनके घर जाना बहुत सालों से नहीं हो पाया था। इधर जब मैं गई तो बातों बातों में पप्पू की बात तो आनी ही थी। उनका घर जो कि एक समय में अच्छा दिखता था अब उसकी दशा नाजुक थी।
मैंने पूछा 'पप्पू को दिखता नहीं, इसे ठीक क्यों नहीं करवाता?'
इस पर उसकी माँ ने कहा: "अब वो यहाँ आता ही कहाँ है। ये घर मिट्टी का है न, उसके और बच्चों के जूते/कपड़े ख़राब हो जाते हैं। जब आता है होटल में ठहरता है और हमें वहीं बुलवा लेता है।"
मैंने बोला 'और आप मिलने चली जाती हैं।'
उन्होंने कहा: "क्या करूँ माँ हूँ न दिल नहीं मानता कि बच्चों के आने पर उनसे न मिलूँ।"
जब से मिल कर आई हूँ कुँअर बेचैन की पंक्तियाँ बार-बार मन में घुमड़ रही हैं:
"जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रम जल ने
दादी की हँसुली ने माँ की पायल ने
उस कच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने में कतराती है।"
आज उसके पास एक राज्य की राजधानी में बड़ा घर, गाड़ी विथ ड्राइवर है जिसके मद में छोटे शहर के छोटे घर और उसमें रहने वाले अपने माँ-बाप को भूल गया है। जब उसके माँ-पापा का संघर्ष और स्नेह मुझे याद है फिर वो कैसे भूला बैठा है। काश मेरी बात उस तक पहुँचे...

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