सभ्यता ने दी है मात्र विवशताएँ,
~~~~~~~~~~~~~~ और वर्जनाएँ।
सभ्यता से परे
आवरण और मुखौटों से परे
हम हो जाते हैं मुक्त, स्वच्छन्द,
और सद्य: स्नात सुबह की तरह मनोरम।
रात हो चुकी है,
दिन भर की ओढ़ी हुई सभ्यता से,
हम थक चुके हैं।
फिर सुबह होगी
प्रातः स्नान से धुल जाएगा,
सभ्यता का मैल।
इसके बाद?
फिर वही दिन
फिर वही सभ्यता
फिर वही विवशता!!
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