Sunday, 12 April 2015

चुप्पियाँ




हमेशा चुप्पियाँ नहीं ढल पाती समय के साँचे में... चुप्पियाँ कभी कभी बहुत कुछ अनकहा छोड़ देती हैं... याद करो न जब झरते हरसिंगार के तले मैं कहती थी कि सुनो मेरी ख़ामोशी को...

तुम कहते थे कि "अगर ख़ामोशी सब कह पाती तो शब्द बने ही न होते... प्रकृति आवाज़ बनाती ही नहीं... और तुम्हारी आवाज़ भी तो मुझे सुननी है।"

याद आया न? इसलिए मुझे कहने दो जो कि कहना है... जो समय कहलवा लेना चाहता है मुझसे... 

हाँ तुम बस इतना करो कि जब मैं कहूँ तुम सुनो बस ख़ामोशी से...

सुनो, सुनो न!!

फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!

वही जहाँ
पिछले जनम में
हम बैठा करते थे
उसके नीचे और
वो बारिश करता था
हमारे ऊपर अपने प्रेम की
मुझे सब याद है
तुम भूले तो नहीं...

वो हरसिंगार
फिर बुलाता है
रोज़ सपनों में आता है
ठीक उसी बेला में
मैं फिर चौंक जगती हूँ
तुमको पुकारती हूँ
जवाब नहीं मिलता तुमसे
तुम भूले तो नहीं न...

सुनो, सुनो न!!
फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!"

Saturday, 27 September 2014

किसी दिन तो ये आग जलाएगी तुझको,
किसी दिन तो खाक़ होगा तू भी मेरी तरह!!

Thursday, 25 September 2014

आहट है तुम्हारे आने की 

या 

फिर पतझड़ में पेड़ों से पत्ते गिरे है.


या कि हवा गुज़री है सरसराती पत्तों से

 
या कि हवा से संदेशा भेजा है तुमने...


या कि हमेशा की तरह...     


तुमने कुछ किया हीं नहीं

और पेड़ भी दुखी हैं मेरे दुःख से

और हवा आई है अपने आप

मुझे सहलाने को. ..

एकला चलो रे

मेरे मन सुबह से बस एक ही पंक्ति घूम रही है:

"एकला चलो रे"

ये कौन मुझसे कह रहा है... कौन मुझे बता रहा है... कौन है जो समझा रहा है?



Monday, 1 October 2012


             या कुन्देन्दु-तुषारहार-धवला या शुभ्र -वस्र्त्रावृता या वीणावरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना........