Saturday, 4 March 2017

मेरा जन्म और नाम: एक दास्तां




मैं ऊपर वाले से बहुत मिन्नतों से माँगी गई दुआ हूँ... बहुत इंतज़ार के बाद पूर्ण हुई प्रार्थना हूँ...


ये घटना 1973 की है... माँ की शादी को 15 साल हो चुके थे और उनके कोई बच्चा नहीं हुआ था। माँ कहती थी इस बात को लोगों ने कितना सीरियस बनाया हुआ था इस पर उसने कभी गौर नहीं किया था। अपनी नौकरी अपने परिवार के साथ इतना लम्बा वक़्त बिना किसी बच्चे के बीत रहा है इसका अहसास उन्हें होता था लेकिन काम की लगन और परिवार के साथ में भूल जाती। उन्होंने लिखा कि जब भी बच्चे का ख़याल आता तो सामने लड़की ही दिखती। लेकिन पहली बार बच्चा नहीं होने को शिद्दत से तब महसूसा जब एक शाम को एक गली से गुज़रते हुए उसने एक घर की एक महिला को अपने बारे में बात करते सुना।

हुआ कुछ यूँ था कि स्कूल के कैम्पस में खेलते हुए कुछ बच्चों ने कचरा फैला दिया था। मेरी माँ ने उन बच्चों की माँ से साफ़ करने को कहा। उस समय उसने साफ कर दिया लेकिन जब शाम में मेरी माँ उधर से गुज़र रही थी तो उसने सुना कोई औरत बोल रही थी "खुद के तो कोई बच्चा नहीं है तो साफ़-सफाई की ज़्यादा ही चिंता करती है। बच्चों से प्यार नहीं शायद इसी लिए भगवान ने 'बाँझ' रखा।

माँ ने अपनी डायरी में लिखा है "मुझे बस एक शब्द ही सुनाई दिया 'बाँझ' और उस रात मैं पहली बार इस बात पर गौर किया था। उस रात मैंने पहली बार ईश्वर को कहा मुझे एक बच्चा चाहिए, एक बेटी चाहिए।" माँ बताती थी कि उस रात एक सपना आया कि लाल फ्रॉक में एक लड़की पालने में है और माँ-माँ कह के बुला रही है। नींद खुलने के बाद वो बहुत देर तक सोचती रही कि ऐसा तो पहले भी किसी के साथ हो चुका है और साथ ही यकीन भी कि अब उनकी गोद भरेगी।

माँ शारदामणि (रामकृष्ण परमहंस की पत्नी) उनके जन्म की भी यही कहानी थी। उनकी माँ ने भी बरसों के बाद एक रात सपने में देखा था कि वो कहीं उदास बैठी हैं तभी एक 5 साल की लड़की लाल फ्रॉक पहने हुए पीछे से उनके गले में बाहें डालती है और माँ कह कर पुकारती है। उसके बाद उन्हें पता चलता है कि वो माँ बनने वाली हैं। सम्भवतः मेरी माँ इस वाकये को जानती थी इसलिए मन में कहीं रही हो और इसी वजह से उन्हें ये सपना आया या फिर प्रकृति ने उन्हें भी कोई इशारा किया था। उसके बाद ही उन्हें खबर हुई कि मैं आने वाली हूँ।

मेरी माँ के मन में एक ख़याल आया कि मेरा नाम शारदा ही रखें लेकिन फिर उन्होंने इसे टाला और मेरा नाम 'रीना' रखा। मेरे बचपन के दोस्त और वो जगह जहाँ मैं पली बढ़ी, वहाँ के लोग आज भी मुझे रीना पुकारते हैं। जब मैं 5 वीं में आई तब माँ के स्कूल में साइंस के एक शिक्षक आए, उनका नाम देवेन्द्र प्रसाद था। उन्होंने पहले ही दिन मुझे देखने के बाद कहा "मैडम इस बच्ची का नाम इस पर ज़रा भी नहीं जँचता है, इसका नाम कुछ अलग होना चाहिए।"

माँ ने उनसे कहा "आप सुझाइए कोई नाम" और उन्होंने कहा "शारदा" कुछ पल बाद कहा "शारदा सुमन" 


माँ कहती थी मैंने भी सोचा शायद प्रकृति ने फिर कोई इशारा किया है और इसे मंज़ूर कर लेना चाहिए। और इस तरह मेरा नाम "शारदा सुमन" पड़ा और मुझे मेरा नाम बेहद पसंद है।


Sunday, 12 April 2015

चुप्पियाँ




हमेशा चुप्पियाँ नहीं ढल पाती समय के साँचे में... चुप्पियाँ कभी कभी बहुत कुछ अनकहा छोड़ देती हैं... याद करो न जब झरते हरसिंगार के तले मैं कहती थी कि सुनो मेरी ख़ामोशी को...

तुम कहते थे कि "अगर ख़ामोशी सब कह पाती तो शब्द बने ही न होते... प्रकृति आवाज़ बनाती ही नहीं... और तुम्हारी आवाज़ भी तो मुझे सुननी है।"

याद आया न? इसलिए मुझे कहने दो जो कि कहना है... जो समय कहलवा लेना चाहता है मुझसे... 

हाँ तुम बस इतना करो कि जब मैं कहूँ तुम सुनो बस ख़ामोशी से...

सुनो, सुनो न!!

फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!

वही जहाँ
पिछले जनम में
हम बैठा करते थे
उसके नीचे और
वो बारिश करता था
हमारे ऊपर अपने प्रेम की
मुझे सब याद है
तुम भूले तो नहीं...

वो हरसिंगार
फिर बुलाता है
रोज़ सपनों में आता है
ठीक उसी बेला में
मैं फिर चौंक जगती हूँ
तुमको पुकारती हूँ
जवाब नहीं मिलता तुमसे
तुम भूले तो नहीं न...

सुनो, सुनो न!!
फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!"

Saturday, 27 September 2014

किसी दिन तो ये आग जलाएगी तुझको,
किसी दिन तो खाक़ होगा तू भी मेरी तरह!!

Thursday, 25 September 2014

आहट है तुम्हारे आने की 

या 

फिर पतझड़ में पेड़ों से पत्ते गिरे है.


या कि हवा गुज़री है सरसराती पत्तों से

 
या कि हवा से संदेशा भेजा है तुमने...


या कि हमेशा की तरह...     


तुमने कुछ किया हीं नहीं

और पेड़ भी दुखी हैं मेरे दुःख से

और हवा आई है अपने आप

मुझे सहलाने को. ..

एकला चलो रे

मेरे मन सुबह से बस एक ही पंक्ति घूम रही है:

"एकला चलो रे"

ये कौन मुझसे कह रहा है... कौन मुझे बता रहा है... कौन है जो समझा रहा है?



Monday, 1 October 2012


             या कुन्देन्दु-तुषारहार-धवला या शुभ्र -वस्र्त्रावृता या वीणावरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना........