Thursday, 4 May 2017

कहानी वत्स गोत्रीय कन्या के भारद्वाजों की बहू होने की




कहानी वत्स गोत्रीय कन्या के भारद्वाजों की बहू होने की...
भाग-2

1995 के अंत से मेरी शादी की थोड़ी बहुत चर्चा शुरू हो चुकी थी, ये वो समय था जब शाहरूख खान की "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे" आ चुकी थी और मेरे दोस्तों के साथ-साथ मेरी फैमिली में भी शाहरुख़ सबको बहुत पसन्द आ रहा था। लेकिन इससे पहले दो फ़िल्म आ चुकी 1992 में रोज़ा और 95 में बॉम्बे और दोनों में ही हीरो थे 'अरविंद स्वामी'। दोनों ही फ़िल्मे शादी से शुरू होकर आगे की ज़िन्दगी की थी। जहाँ सब शाहरुख खान को पसन्द कर रहे थे वहीं मुझे अरविन्द स्वामी अच्छा लगा था। दोनों ही फिल्मों में कोई तड़क-भड़क, बड़े घरों की कहानी, फ़ालतू की कॉमेडी नहीं थी, तो मेरा सीधा सादा मन हम जैसे घरों की ही कहानी पर रुक गया था।

ऐसे में जब मुझे देखने के लिए मेरी सासु माँ अपने बेटे के साथ आईं और मैंने एक झलक देखने पर ही पाया कि ये तो कुछ-कुछ वैसा ही है हालाँकि मैं लगातार रो रही थी। और अपने रोने का कारण आज तक समझ नहीं पाई हूँ।

तो मेरी शादी का कार्यक्रम शुरू हो चुका था और दिन में 5 बार मुझे उबटन लगाया जा रहा था... माँ आमतौर पर बस एक बार आकर विधि की शुरुआत करती और हट जाती थी। बाकी भाभी, मौसी, दीदी, चाची वगैरह गीत गाती और उबटन लगा कर काजल लगा देतीं।

"कथी के कटोरी में आगर चन्दन, कथी में तेल फुलेल
अपटन लागि रही
सोने कटोरी में आगर चन्दन, चाँदी कटोरी फुलेल
अपटन लागि रही
आजु सिया जी के अपटन लगाऊ, मंगल गीत सुनाऊ
अपटन लागि रही।"

पियरी यानि पीली साड़ी और काजल लगाए हुए मैं तनिक अलग सी दिख रही थी। हमारे इधर कहते हैं कि इससे लड़कियों पर सीरी चढ़ती है और वो सुंदर दिखती है। जबकि पूरा शरीर हल्का पीला दिखता है।

(एक तस्वीर अरविंद स्वामी की है बाकी तीन मेरी कहानी के हीरो की।)


क्रमश: :)

Monday, 1 May 2017

कहानी वत्स गोत्रीय कन्या के भारद्वाजों की बहू बनने की... (भाग 1)




कोई कहता है कि मैं सुंदर हूँ तो मैंने मान लिया कि हूँ, किसी ने कहा कि मुझे ग़लतफ़हमी है कि मैं सुंदर हूँ तो उसे समझा दिया कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी नहीं है, मैं जो भी हूँ मुझे पता है। मैं जानती हूँ कि बहुतों के सामने मैं कुछ भी नहीं लेकिन इससे क्या होता है... 

वो जो बहुत ख़ूबसूरत हैं वो अपने लिए हैं। उनकी अपनी ज़िन्दगी है और वो अपनी उस कहानी में मुख्य पात्र हैं लेकिन ये मेरी ज़िन्दगी है जिसकी हीरोईन तो मैं ही हूँ। मुझे न किसी से कोई कॉम्पलेक्स है न कोई जलन है।

तो अब बात मेरी: आज से 20 साल पहले ठीक यानि कि 16 मई 1996 को मेरी शादी का फंक्शन शुरू हुआ था, पहला दिन यानि सगुन की हल्दी लगी और शादी का मंडप बनाया गया था। शादी बहुत ही जल्दी में तय हो गई थी, मेरी सासु माँ की मेरी मम्मी से पुरानी पहचान थी। उन्होंने रिश्ता माँगा और माँ ने थोड़ी ना-नुकुर के बाद रिश्ते को मंजूरी दे दी थी। जब सासु माँ अपने परिवार के साथ मुझे देखने आई थीं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि:
"मेरे बेटे को तुम पसन्द हो लेकिन क्या तुम्हें मेरा बेटा पसन्द है?"
मैं चुप रही।

उन्होंने सवाल फिर दुहराया।

और मैं बेसाख़्ता बोल पड़ी: मैं कोई मुस्लिम हूँ कि क़ुबूल है, क़ुबूल है कहना ही पड़ेगा।

ख़ैर तो ऐसे शुरू हुई थी ये कहानी...


क्रमशः

Thursday, 27 April 2017

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह

बदलते देखा है जिनको मौसमों की तरह,
कल बदलेंगे हम भी उनको कैलेंडर की तरह...!!

हमारी दास्ताँ यूँ ही रायगाँ हो न पाएगी...
पढ़े जाएँगे हम भी कभी निसाबों की तरह...!!

उन आँखों में हमें आज अपनी पहचान न मिली...
जिनका दावा था रहते हो इनमें पुतली की तरह...!!

गंगाजल की तरह संभाला था जिनको हमने...
अपनी आँखों से बहा देंगे उनको आँसू की तरह...!!

रायगाँ= व्यर्थ
निसाबों= पाठ्य पुस्तक

Tuesday, 25 April 2017

ईश्वर की कृति

स्याही जब समाती है
बूँद-बूँद मुझमें
तब लिखी जाती है कविता
और तब लिखी जाती है
तमाम मुश्किलों के बाद
सम्भावनाएँ, उम्मीद और जीवन...
ईश्वर ने दिया है मुझे जीवन
बहुत ही मिन्नतों मनौतियों के बाद
ताकि रची जा सके ख़ुशी
बीजी जा सके कोरी आँखों में सपने
और उगाई जा सकें
उससे प्रेम और विश्वास की फसलें...
मुझे यकीन है खुद पर कि
मैं बिखेरती हूँ ख़ुशी
और बहती नदी सी मैं
बहा ले जाती हूँ अपने साथ
पास आने वालों के
दुःख के कारण और अकारण को...
मुझे यकीन है खुद पर कि
मैं हूँ ईश्वर की एक अनुपम कृति...!!

(मेरे आँचल में जो ये सितारे टँके हैं न, वो सब सारी परेशानियां और दर्द है जो कोई मुझसे बाँट गया और ये जो चेहरे पर ख़ुशी है न वो उस विश्वास से आया है जो मेरे आसपास के लोगों का मुझ पर है। इसीलिए आत्ममुग्धता से भी ज़्यादा पसंद हूँ मैं खुद को...

चाक देखा है?

सुनो!!
चाक देखा है?
वही चाक कुम्हार वाला
जो नाचता रहता है
एक कील पर
जो स्थिर रहता है
मगर उसके ऊपर गति होती है
जिससे होता है सृजन
है न?

बस
तुम वही कील बनो
अपने भीतर उसी कील को पा लो
जहाँ तुम स्थिर ही रहो
और अपने भीतर स्थित कील के सहारे
नाचने दो संसार को
ताकि सृष्टि में होता रहे
सृजन
होता रहे
नवनिर्माण...
(एक सलाह)

Saturday, 4 March 2017

मेरा जन्म और नाम: एक दास्तां




मैं ऊपर वाले से बहुत मिन्नतों से माँगी गई दुआ हूँ... बहुत इंतज़ार के बाद पूर्ण हुई प्रार्थना हूँ...


ये घटना 1973 की है... माँ की शादी को 15 साल हो चुके थे और उनके कोई बच्चा नहीं हुआ था। माँ कहती थी इस बात को लोगों ने कितना सीरियस बनाया हुआ था इस पर उसने कभी गौर नहीं किया था। अपनी नौकरी अपने परिवार के साथ इतना लम्बा वक़्त बिना किसी बच्चे के बीत रहा है इसका अहसास उन्हें होता था लेकिन काम की लगन और परिवार के साथ में भूल जाती। उन्होंने लिखा कि जब भी बच्चे का ख़याल आता तो सामने लड़की ही दिखती। लेकिन पहली बार बच्चा नहीं होने को शिद्दत से तब महसूसा जब एक शाम को एक गली से गुज़रते हुए उसने एक घर की एक महिला को अपने बारे में बात करते सुना।

हुआ कुछ यूँ था कि स्कूल के कैम्पस में खेलते हुए कुछ बच्चों ने कचरा फैला दिया था। मेरी माँ ने उन बच्चों की माँ से साफ़ करने को कहा। उस समय उसने साफ कर दिया लेकिन जब शाम में मेरी माँ उधर से गुज़र रही थी तो उसने सुना कोई औरत बोल रही थी "खुद के तो कोई बच्चा नहीं है तो साफ़-सफाई की ज़्यादा ही चिंता करती है। बच्चों से प्यार नहीं शायद इसी लिए भगवान ने 'बाँझ' रखा।

माँ ने अपनी डायरी में लिखा है "मुझे बस एक शब्द ही सुनाई दिया 'बाँझ' और उस रात मैं पहली बार इस बात पर गौर किया था। उस रात मैंने पहली बार ईश्वर को कहा मुझे एक बच्चा चाहिए, एक बेटी चाहिए।" माँ बताती थी कि उस रात एक सपना आया कि लाल फ्रॉक में एक लड़की पालने में है और माँ-माँ कह के बुला रही है। नींद खुलने के बाद वो बहुत देर तक सोचती रही कि ऐसा तो पहले भी किसी के साथ हो चुका है और साथ ही यकीन भी कि अब उनकी गोद भरेगी।

माँ शारदामणि (रामकृष्ण परमहंस की पत्नी) उनके जन्म की भी यही कहानी थी। उनकी माँ ने भी बरसों के बाद एक रात सपने में देखा था कि वो कहीं उदास बैठी हैं तभी एक 5 साल की लड़की लाल फ्रॉक पहने हुए पीछे से उनके गले में बाहें डालती है और माँ कह कर पुकारती है। उसके बाद उन्हें पता चलता है कि वो माँ बनने वाली हैं। सम्भवतः मेरी माँ इस वाकये को जानती थी इसलिए मन में कहीं रही हो और इसी वजह से उन्हें ये सपना आया या फिर प्रकृति ने उन्हें भी कोई इशारा किया था। उसके बाद ही उन्हें खबर हुई कि मैं आने वाली हूँ।

मेरी माँ के मन में एक ख़याल आया कि मेरा नाम शारदा ही रखें लेकिन फिर उन्होंने इसे टाला और मेरा नाम 'रीना' रखा। मेरे बचपन के दोस्त और वो जगह जहाँ मैं पली बढ़ी, वहाँ के लोग आज भी मुझे रीना पुकारते हैं। जब मैं 5 वीं में आई तब माँ के स्कूल में साइंस के एक शिक्षक आए, उनका नाम देवेन्द्र प्रसाद था। उन्होंने पहले ही दिन मुझे देखने के बाद कहा "मैडम इस बच्ची का नाम इस पर ज़रा भी नहीं जँचता है, इसका नाम कुछ अलग होना चाहिए।"

माँ ने उनसे कहा "आप सुझाइए कोई नाम" और उन्होंने कहा "शारदा" कुछ पल बाद कहा "शारदा सुमन" 


माँ कहती थी मैंने भी सोचा शायद प्रकृति ने फिर कोई इशारा किया है और इसे मंज़ूर कर लेना चाहिए। और इस तरह मेरा नाम "शारदा सुमन" पड़ा और मुझे मेरा नाम बेहद पसंद है।


Sunday, 12 April 2015

चुप्पियाँ




हमेशा चुप्पियाँ नहीं ढल पाती समय के साँचे में... चुप्पियाँ कभी कभी बहुत कुछ अनकहा छोड़ देती हैं... याद करो न जब झरते हरसिंगार के तले मैं कहती थी कि सुनो मेरी ख़ामोशी को...

तुम कहते थे कि "अगर ख़ामोशी सब कह पाती तो शब्द बने ही न होते... प्रकृति आवाज़ बनाती ही नहीं... और तुम्हारी आवाज़ भी तो मुझे सुननी है।"

याद आया न? इसलिए मुझे कहने दो जो कि कहना है... जो समय कहलवा लेना चाहता है मुझसे... 

हाँ तुम बस इतना करो कि जब मैं कहूँ तुम सुनो बस ख़ामोशी से...

सुनो, सुनो न!!

फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!

वही जहाँ
पिछले जनम में
हम बैठा करते थे
उसके नीचे और
वो बारिश करता था
हमारे ऊपर अपने प्रेम की
मुझे सब याद है
तुम भूले तो नहीं...

वो हरसिंगार
फिर बुलाता है
रोज़ सपनों में आता है
ठीक उसी बेला में
मैं फिर चौंक जगती हूँ
तुमको पुकारती हूँ
जवाब नहीं मिलता तुमसे
तुम भूले तो नहीं न...

सुनो, सुनो न!!
फ़िर से झरने लगे हैं
हरसिंगार!!"